इंटरनेशनल भिखारी



मुहतरम ह़ज़रात।
अस्सलामु अलैकुम व
 रह़मतुल्लाहि व बर कातुह

अल्लाह  त आला फ़रमाते हैं

क़ुल इनंकुंतुम तुहिब्बुनल्लाह फत्तबिऊनी

कह दिजिये( मेरे बन्दों से) अगर तुम अल्लाह से मुहब्बत करते हो तो मेरी( मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की) पैरवी करो!

 हम कलिमा वाले हैं मगर हम कलिमा और ईमान वाली जिन्दगी को छोड़ कर  अल्लाह के दुश्मन वाली  ज़िन्दगी को पकडे हूए हैं!

    अल्लाह पाक ने अपने प्यारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को मुकम्मल दीने इसलाम देकर भेजा और फ़रमाया

 कि तुम्हारे लिए मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम  बेहतरीन नमूना और आईडिल हैं  मगर अफसोस के  अल्लाह ने जिस के वास्ते दुनिया बनाई  और जिस के लिए जन्नत सजाई  आज उस ज़ाते अक़दस की ज़िंदगी हमें अचछी नहीं लगती है जबकि दुनिया और आखिरत की कामयाबी  अल्लाह ने उसी ज़ाते  अक़दस की पैरवी मे रखी है !

मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व वसल्लम ने फ़रमाया  शादी मेरी सून्नत है और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम  ने  एक दो नहीं बल्कि गयारह शादियां करके अपनी  उम्मत को ये सन्देश दिया के इस इबादत(शादी) को किस सादगी से करना है!
             
             मगर अफ़सोस के आज का नामवर मुसलमान भी निकाह़ व शादी को इस क़दर मुश्किल बना दिया है के ग़रीब बाप के दिन काचैन व सुकून और रातों की नींदें ह़राम हो गई हैं!

            दाई ए इसलाम मौलाना कलीम सिद्दक़ी साहब लिखते हैं के  दरभंगा से दो बहनों का  मुझे फ़ून आया के हज़रत हम दो बहनें हैं  और हमारी शादी नहीं हो पा रही है  जबकि अलहम्दु लिल्लाह हम दोनों बहनें  शिक्षत  और खूबसूरत भी हैं मेहमान आते हैं हमें देखते ही फूले नहीं समाते हैं लेकिन वापस जाने के बाद इनका र कर देते हैं क्योंकि हम लोग ग़रीब हैं उनको जहेज़ की शकल मे भीक देने की हैसियत हमारे अब्बू के पास नहीं है !

            अपनी सिस्कियों पे काबू पाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहतीं हैं कितने महीनों से हमारे माँ  बाप रातों को सोए नहीं हैं उंकी नींदें हराम होगई  हैं  बडी बहन कहने लगी कि हज़रत !

   कल रात जब मेरी आँख खुली तो मैंने देखा के  अब्बू मुसल्ला पर बैठे हिचकयों और सिस्कियों के साथ रो रहे हैं और अल्लाह अल्लाह के हुज़ूर शिकवे और शिकायतें कर रहे हैं जब मै क़रीब हूई तो सुना के अब्बू बार बार कह रहे थे कि एलाही तू ने तो  बेटियों को रह़मत बनाया है मगर आज मेरी बेटियाँ मुझ पर बोझ  बन गई हैं मेरे आक़ा मुझ ग़रीब पर रह़म फ़रमा !

    उसके बाद बिलक बिलक कर रोने लगे!


              ह़ज़रत! पूछना ये है कि ऐसी स्थिति मे हम दोनों बहनें आत्महत्या कर सकती हैं?     क्या हमारे लिए आत्महत्या( खूद कुशी)  करना अब भी जाएज़ नहीं??

      ये गुनहगार बडे ही अदब के साथ  अपनी मुस्लिम समुदाय के  अंतरराष्ट्रीय भीकारीयों  ये पूछना चाहता है कि अगर आप मे या आप के बेटे मे किसी की बेटी या बहन के नाम व नफ़क़ा और ज़िंदगी के ज़रूरीयात के सामान  देने मे सक्षम नहीं हैं तो फिर आप शादी ही क्यों करते हैं?    आप जैसे फक़ीरों  के लिए ही शरीयत का हुक्म है कि ऐसे लोग रोज़े रखें!


मेरे इसलामी भाईयों! हमनें ये कैसा समाज और सुसाइटी बना रखा है?    जिसमें निकाह़ और शादी ब्याह जैसी इबादत इतनी मुश्किल हो गई है कि   परदे रहने वाली बहनों और बेटियों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया है!



प्यारे भाईयों!   आइए इस मनहूस रस्म रिवाज  से आज हम पक्की तौबा कर लें  वरन दुनिया और आखिरत  मे बरबादी लिखा हुआ है !   निकाह़ और शादी के ज़रिए एक नई ज़िन्दगी का  शुरूआत होता है उसके ज़रिए एक नई नस्ल तैयार होती है


यही वजह है कि शादी के कुछ दिन या कुछ साल बाद ही मियाँ बीवी  के बीच इस प्रकार तनाव और खटास पैदा हो जाती है के  दोनों की ज़िंदगी नर्क बन जाती है या फिर त़लाक़ हो जाती है।अल्लाह पाक शरीअत
व सुन्त के साथ साथ खूशहाल  ज़िन्दगी नसीब फरमाए ( आमीन)

दुआवों  का मुह़ताज !

मोहम्मद लुक़मान
MOHAMMAD LUQUMAN

JAMIA ISLAMIA QURANIA SEMRA WEST CHAMPARAN

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