तक़वा किसे कहते हैं


                     
        इबादते इलाही के जरिये एक इंतहाई अहम चीज जो इंसान को हासिल होती है वह "तक्वा" है, अर्थात अपने प्रत्येक मामले को अल्लाह के सुपुर्द करना, हर बात में उसकी मदद चाहना, कोई भी काम करते समय इस बात से डर महसूस करना कि कहीं यह काम गलत न हो जाए और अल्लाह नाराज न हो जाए। इंसान पर अल्लाह का डर उसी समय रह सकता है, जबकि इंसान अल्लाह की इबारत में लगा रहे। अल्लाह की इबादत से कटकर या उससे गाफिल होकर तक्वा की सोच बेमानी है और अल्लाह से डर प्राप्त करना असंभव है, क्योंकि इबादत न करने की स्थिति में अल्लाह से दूरी हो जाती है और जब कोई इंसान अल्लाह से दूरी एख्तियार कर लेता है तो शैतानी और दुनिया के असरात उस पर आने लगते हैं और वह दुनिया की चीजों को प्राप्त करने में लग जाता है, उस की इच्छा होती है कि अधिक से अधिक धन अर्जित करे, जिसकी बुनियाद पर खूब ऐश करे, अच्छे से अच्छा खाये, उम्दा से उम्दा गाड़ियों में घूमे, बेहतरीन सा लिबास पहने और भव्य बृहत मकानों में रहे। मगर जो व्यक्ति तक्वा एख्तियार करता है वह इन सब चीजों को बेफायदा समझता है, क्योंकि उसके जहन में यह ख्याल सदैव रहता है कि दुनिया की जिन्दगी तो कुछ दिनों की है, जो पलक झपकने के समय में समाप्त हो जायेगी, चाहे तंगी से गुजरे या आराम से गुजरे, यह जिंदगी तो गुजर जानी है। इसलिए इतनी संक्षिप्त सी जिंदगी के लिए असीमित धन जमा करने का क्या फायदा, बहुत मजबूत और भव्य इमारतें बनवाने से क्या हासिल जिसमें इंसान अधिक समय तक नहीं रह सकता।

        Mohammad Luquman

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