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Showing posts from March, 2019

( कब्र मनुष्य को कहती है )

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                     ﷽ अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहे व बरकातुह          मुहतरम हज़रात कब्र मनुष्य को कहती है के  ऐ आदम की औलाद मैने तेरा हर दिन ईन्तेजार किया , क्या तुने मुझे याद किया ?? जरा सुन ! मेरे अंदर अंधेरा है , नमाज की रोशनी लेते आना ! मेरे अंदर गभराहट है , तिलावते कुरआन लेते आना ! मेरे अंदर साँप और बिच्छु है , नबी सलल्लाहु अलैही वसल्लम की सुन्नत लेते आना ! मेरे अंदर आग है , खौफे खुदा का पानी लेते आना !                 !!! याद रख !!! आज अमल है , हिसाब नही ! कल हिसाब होगा , अमल नही अल्लाह पाक हमें अजाबे कबर से बचाए....आमीन !   कयामत के दिन सवाल ये भी पुछा जायेग जवानी कैसे गुजारा माल कैसे कमाया हलाल या हराम। 5जगह हसना  बडे गुनाहों के बराबर है 1.कब्रस्तान में 2.जनाजे के पीछे         3.मजलिस में 4.तिलावत -ऐ- कुरान में 5.मस्जिद मे अकेले हो?      अल्लाह को याद करो परेशान हो?  ...

झूठी क़समें

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                               ﷽ अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बर कातुह। मुहतरम हज़रात ।      कभी कभी हम और आप कसमें खा खा कर ये बताने की       की कोशिश करते हैं कि जो कुछ कह रहे हैं वह सच है। अक्सर लोग ऐसे मौका पर अल्लाह कसम। कुरआन कसम,इमाम से कहा करते हैं ये बात ठीक नहीं । ऐसी कसमें खानी बुरी बात है         अगर आप सच कह रहे हैं तो कसम की क्या ज़रूरत? अगर झूठ बोल रहे हैं तो कसम खाकर आप सुनने वालों को धोखा दे रहे हैं। और अल्लाह के नाम की बेअदबी कर रहे हैं, अगर कोई आप पर कसम के लिए ज़ोर दे और बात सच्ची हो ,तो कसम खा सकते हैं। वर न बेला वजह हरगिज़ कसम न खाएं झूठी कसम खाना बहुत बडा गुनाह है। मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व  वसल्लम ने फरमाया :-        झूठी कसम खाना ऐसा बडा गुनाह है जैसा शिरक करना। ये भी याद रखें अल्लाह के सेवा किसी और का कसम खाना। जैसे ये कहना कुरआन की कसम, बाप की कसम, तुम्हारे सर की कसम, मक्का की कसम, ईमान की कसम ये...

सच और झूठ

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﷽ मुहतरम हज़रात        अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह व बरकातुह          जो बात जिस तरह हो उसको वैसे ही बयान करना चाहिए।अपनी तरफ से उसमे कमी बेशी न करना सच कहलाता है और घटा बढाकर बयान करना या जो न हुआ हो । उसको बताना के होगया । जो होगया उसको कहना के नही हुआ। ये झूठ कहलाता है। जैसे के सुबह को उठने मे देर हो गई औफिस देर से आए , जब औफिस का मालिक या मैनेजर ने पूछा  देर कैसे हूई क्यों हूई। अब अगर आप असली बात बता देते हैं तो ये सच है। और अगर आप ने कह दिया गाडी ,छूट गई ट्रेन लेटे हो गई या कोई और बात बना दी ये झूठ है, इसलाम का हुक्म ये है कि जो बात जिस प्रकार हो । उसको ऐसी ही बयान करो । उसमे कमी बेशी मत करो।          इसलाम ने सच को हर समय पर हर मौके पर लाजिम किया है और झूठ को हराम बताया है।झूठ को गन्दगी और नापाकी फरमाया है ।        रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहे व सल्लम ने फरमाया:- मुसलमान सब कुछ हो सकता है मगर झूठा नहीं हो सकता         हमारे हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अल...

फैसला करने वालों की बुनियादी जिम्मेदारी

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                           ﷽             अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह फैसला_करने- वालों_की_बुनियादी_जिम्मेदारी               किसी भी समाज में एख्तिलाफ और नजा स्वभाविक बात है, ऐसे मामलों के समाधान के लिए लोग परिवार और समाज के अनुभवी बड़े बुजुर्गों की तरफ निहारते हैं और उनके फैसले को मानते हैं। यह एख्तिलाफ जरा बड़ा हो, तो अधिकतर लोग परिवार और समाज के बड़े बुजुर्गों के बजाय सरकारी अदालतों में जाते हैं, मात्र इसलिए कि अदालतें अपने फैसले को लागू करने के लिए पुलिस की ताकत और हुकूमत की सलाहियत भी रखती है। इसी ताकत और सलाहियत के लिये इस्लामी कानून में कूवते नाफिजा का शब्द व्यवहृत है। यह कूवते नाफिजा या पुलिस की ताकत और हुकूमत की सलाहियत "फैसला" का अंश नहीं है, फैसला का मतलब है कानून के अनुसार हक और सच का इजहार। किसी भी मामले में सच को झूठ से अलग करना, दावा और दलील के अनुसार देखना, गवाहों की विवेचना करना, फैसला करने वाले की बुनियादी जिम्मेदारी है। ...

मनुष्य को पैदा करनेका उद्देश्य

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।।।।।।।।।।।।।।।।।।।﷽।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।      अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहिवरकातुह। मानव रचना का उद्देश्य कुरआन ये बयान करताहै कि मै ( अल्लाह  )ने जिन्नात और इनसान को सिर्फ अपनी पूजा के लिए पैदा किया है।         रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि  वसल्लम ने फ़रमाया दुनिया तुम्हारे लिए बनाई गई है और तुम आख़िरत के लिए बनाए गए हो!     कक़ुरआन शरीफ़ और हदीस की रोशनी मे हम अपना  जाएज़ा लेते हैं तो पता चलता है के  अपने मक़सद से कोसो दूर हैं क्योंकि हमनें ज़रूरत को मक़सद बना रखा है और मक़सद को भुला दिया है।       दुनिया हमारे लिए बनाई गई है और ये हमारी जरूरत है मगर इसी दुनिया को हमने अपना मकसद बनाकर अपनी जिंदगी को जो एक क़ीमती धन है बरबाद कर रहे हैं और अपने मकसद यानि इबादत को छोड़ कर अपने रब की नाराजगी और हमेशा की नाकामी काहम सौदा कर रहे हैं।   बहुत सारे लोग तो नमाज़ व रोज़ा और ह़ज व ज़कात अदा करकरे इस खूशी मे हैं के हमनें अपने मक़सद का हक़ अदा कर दिया जबकि ये आमाल इसलाम की बुनियाद हैं पूरा इसलाम नहीं   और अल्...

माँ बाप अनमोल नेअमत हैंं

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﷽ अस्सलामु अलैकुम वरह़मतुल्लाहि व बरकखतुह मुह़तरम ह़ज़रात      जवानी मे मनुष्य पिता को शक की  निगाह से देखता रहता है, जैसे पिता को हमारे सारे उन मुद्दों, आव्श्यकताओं तकलीफों या ज़रूरतों का  एहसास ही नहीं।ये नए युग्य  की आवश्यकताओं को नहीं समझता।    कभी कभी हम अपने पिता का तुलना भी शुरू कर देते हैं, इतनी मेहनत हमारे पिता ने की होती, बचत की होती , कुछ, बनाया होता, तो आज हम भी.... फ़लाँ की तरह आलीशान  बंगला होता ,क़ीमती से क़ीमती गाड़ी मे घूम रहे होते!   कहाँ हो ? कब आओगे?  अधिकांश फुज़ूल और फ़ालतू लगते हैं। सूइटर पहना है कुछ और भी पहन लो ठंड बहुत है मनुष्य सोचता है ओल्ड फैशन की वजह से  पिता को बाहर की दुनिया का अनुभव नहीं। अक्सर औलादें  अपने पिता को एक ही मेयार से परखती हैं ,घर, गाड़ी, पलौट , बैंक बैलेंस, कारोबार अपनी नाकामी इत्यादि बाप के खाते में डाल कर  अपने आप को बहुत ज्यादा समझदार बनते हैं। हमारे भी कुछ होता तो हम भी अच्छे स्कूल मे पढते  कारोबार करते।       इसमे शक नहीं, औलाद केलिए आइडियल ...

इंटरनेशनल भिखारी

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﷽ मुहतरम ह़ज़रात। अस्सलामु अलैकुम व  रह़मतुल्लाहि व बर कातुह अल्लाह  त आला फ़रमाते हैं क़ुल इनंकुंतुम तुहिब्बुनल्लाह फत्तबिऊनी कह दिजिये( मेरे बन्दों से) अगर तुम अल्लाह से मुहब्बत करते हो तो मेरी( मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की) पैरवी करो!  हम कलिमा वाले हैं मगर हम कलिमा और ईमान वाली जिन्दगी को छोड़ कर  अल्लाह के दुश्मन वाली  ज़िन्दगी को पकडे हूए हैं!     अल्लाह पाक ने अपने प्यारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को मुकम्मल दीने इसलाम देकर भेजा और फ़रमाया  कि तुम्हारे लिए मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम  बेहतरीन नमूना और आईडिल हैं  मगर अफसोस के  अल्लाह ने जिस के वास्ते दुनिया बनाई  और जिस के लिए जन्नत सजाई  आज उस ज़ाते अक़दस की ज़िंदगी हमें अचछी नहीं लगती है जबकि दुनिया और आखिरत की कामयाबी  अल्लाह ने उसी ज़ाते  अक़दस की पैरवी मे रखी है ! मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व वसल्लम ने फ़रमाया  शादी मेरी सून्नत है और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम  ने  एक दो नहीं बल्कि गयारह शादियां करके अपनी ...

एक शौहर ने अपनी पत्नी को नसीहत किया

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﷽ अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बर कातुह एक साहब ने अपनी बीवी से  ये नसीहत कि के   चार बातों का हर  वक्त ध्यान रखना: पहली बात ये के  मुझे तुम से बहुत ज़्यादा मुहब्बत है। इसलिए मैंने तुमको बीवी के रूप मे पसंद किया।  अगर तुम मुझे अच्छी न लगती तो मैं निकाह़  कर के तुमको घर ही न लाता। आप को बीवी बनाकर इस बात का सुबूत है के  मुझे आप से मुहब्बत है इसलिए मैं इंसान हूँ फरिश्ता नहीं हूँ  अगर किसी समय मैं ग़लती कर लूं छुपा लेना। छोटी मोटी ग़लतियों (कोताहीयों ) के तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए। और दूसरी बात ये के  मुझे ढोल की तरह न बजाना   बीवी ने कहा,  क्या मत़लब ? उसने कहा मान लो अगर मैं  गुस्से मे हूँ तो मेरे सामने उस समय जवाब न देना । मर्द गुस्से में हो  जब कुछ कह रहा हो और आगे से औरत की ज़ुबान चल रही हो तो यह चीज बहुत ख़तरनाक है।अगर मर्द गुस्से में है। तो औरत ठंडा पड जाए और अगर औरत गुस्से मे है तो शौहर को चाहिए के उसको मनाले । दोनों तरफ से एक ही समय मे गुस्सा आजाना यूं है कि रस्सी को दोनों तरफ से खींचने वाली बात है।...

ओलमा की क़दर अवाम की नज़र में

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﷽ रात के लगभग 2 या 3 बज रहे होंगे नींद नहीं आरही थी। वजह यह थी के एहसास ये हो रथा के आलिमों की क्या शान थी लेकिन आज कोई भी आलिम जिसके पास दौलत हो,क्या वह आलिम बन कर ( कहीं इमामत या दीन के कार्य)पसंद करता है ?? ९०% लोग यही जवाब देंगे नहीं, लेकिन ऐसा क्यों? आलिम की ज़िंदगी पर थोड़ा नज़र दौड़ाइए जब हिफ्ज़ करने का ज़माना होता है तब फज्र से ज़ुहर तक और अस्र के बाद मग़रिब के बाद इशा के देर रात तक बस इतना ही नहीं बल्कि फज्र से पहले भी इस तरह पढ़ाई करनी होती है के सर ऊचा न होजाए, जब अरबी पड़ने का वक़्त आता है तो ७ या ८ किताबें पहली कलास थमा दी जाती हैं और जैसे जैसे आगे बढ़ना होता है किताबें भी बढ़ती रहती हैं यहां तक हदीस की बहुत सारी किताबें  पड़ जाते हैं और पड़ाई के ज़माने मे खाने का क्या कहना माशाअल्लाह दुनिया की एक क़ौम है जो खाने मे इतनासब्र करती है उसके बाद क्या होता है बच्चा कम से कम १३ साल पढ़ने के बाद अब वह सोचता है मेरी माँ बीमार बाप बूढ़े हो गए हैं बहनों की शादी भी करनी है और भी कई ज़िम्मेदारीयां हैं कुछ करता हूँ। मगर करूं क्या? मैं हाफिज़ भी हूँ ,आलिम भी हूँ, फाज़िल भी हू...

बिकाऊ मीडिया

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                               ﷽  लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया से भारतीय लोकतंत्र पर गंभीर संकट पैदा हो गए हैं। 2 तीन अखबार और एक दो चैनलों को छोड़ कर अन्य सैकड़ों चैनलों और हजारों समाचार पत्रों ने झूठ और नफरत का झंडा पूरी तरह से थाम लिया है। भारत के समाचार चैनलों और अखबारों ने पिछले तीन वर्षों में सत्ता पक्ष की चापलूसी और चाकरी का ऐसा रवैया अपनाया है कि हर इंसान, जिस में थोड़ी भी शर्म  है, वह पूरी तरह से हैरान है। इन मीडिया वालों की दोहरी भूमिका ने इतिहास रच दिया है। *अरनब गोस्वामी, अंजना ओम कश्यप, रोहित सरदाना, अमीश देवगन, प्रषुण जोशी, सुरेश चवान, सुधीर चौधरी, स्वेता सिंह, रुबिका लियाकत, रुमाना सहर और इनके अलावा कई और ज़मीर फरोश पत्रकारों के वो नाम हैं, जिनके सामने झूठ और जिल्लत भी शर्मिंदा है। खासतौर से बेशर्म अर्नब गोस्वामी और भेदभावी स्वभाव वाले रोहित सरदाना की छवि तो और भी घिनोनी है।*  यह वही मीडिया है जिसने पिछले चार वर्षों से देश के लोगों की मानसिकता को चरमपंथ ...

ह़ज का बुनियादी मक़सद तक़वा है

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﷽                            पूरे आलम से बहुत से मुसलमान हजे बैतुल्लाह के लिए रवाना हो रहे हैं, यानी इस फरीजा की अदायगी के लिए जिसको इस्लाम का बुनियादी सतून कहा गया है, जो महज जिस्मानी इबादत नहीं बल्कि रूहानी इबादत भी है और माली इबादत भी। हज के दिनों में बंदा अल्लाह के बहुत करीब होता है, वह अपने घर को, अपने बच्चों को और अपने अहबाब को, अर्थात हर चीज को छोड़कर बिना सिले हुए कपड़ों में अल्लाह के पाक घर में हाजिर होता है और उसकी खुशनूदी चाहता है। हज के दौरान जो अरकान अदा किए जाते हैं उन पर अल्लाह की जानिब से बड़ा अजर अता किया जाता है। जो लोग हज अदा करने के लिए जाते हैं, उनके लिए जरूरी होता है कि वह तकवा एख्तियार करें, क्योंकि तकवा अल्लाह को बेहद पसंद है और अल्लाह की नजदीकी का जरिया है और क्योंकि हज में बंदा अल्लाह की रजा का तालिब होता है, इसलिए उसके लिए ऐसे कार्य करने जरूरी होते हैं, जिनके जरिए वह अल्लाह की नजदीकी प्राप्त करे। इसीलिए हज के दौरान हाजियों की जो तरबीयत होती है, वह तकवा पर मबनी होती है। हज के दौरान न श...

तक़वा किसे कहते हैं

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                              इबादते इलाही के जरिये एक इंतहाई अहम चीज जो इंसान को हासिल होती है वह "तक्वा" है, अर्थात अपने प्रत्येक मामले को अल्लाह के सुपुर्द करना, हर बात में उसकी मदद चाहना, कोई भी काम करते समय इस बात से डर महसूस करना कि कहीं यह काम गलत न हो जाए और अल्लाह नाराज न हो जाए। इंसान पर अल्लाह का डर उसी समय रह सकता है, जबकि इंसान अल्लाह की इबारत में लगा रहे। अल्लाह की इबादत से कटकर या उससे गाफिल होकर तक्वा की सोच बेमानी है और अल्लाह से डर प्राप्त करना असंभव है, क्योंकि इबादत न करने की स्थिति में अल्लाह से दूरी हो जाती है और जब कोई इंसान अल्लाह से दूरी एख्तियार कर लेता है तो शैतानी और दुनिया के असरात उस पर आने लगते हैं और वह दुनिया की चीजों को प्राप्त करने में लग जाता है, उस की इच्छा होती है कि अधिक से अधिक धन अर्जित करे, जिसकी बुनियाद पर खूब ऐश करे, अच्छे से अच्छा खाये, उम्दा से उम्दा गाड़ियों में घूमे, बेहतरीन सा लिबास पहने और भव्य बृहत मकानों में रहे। मगर जो व्यक्ति तक्वा एख्तियार करता है वह इन ...