मैं भी कितना अजीब हूँ

              ﷽
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहे व बर कातुह

 _सेहत मंद हूँ तो_

 _अल्लाह`` को भूल जाता हूँ

 _बिजी हूँ तो_
 _नमाज़'' भूल जाता हूँ_

 बुराई करूँ तो

 _अंजाम भूल जाता हूँ_

 _खाता हूँ तो_
 _बिस्मिल्लाह भूल जाता हूँ_

 _खा लूँ तो_
 _अल्हम्दुलिल्लाह_ _कहना भूल जाता हूँ_

 _किसी से मिलूं तो_
 _सलाम''भूल जाता हूँ_  _सोते हुए_
 _तौबा भूल जाता हूँ_

 _गुस्से में तो_
 _बर्दाश्त भूल जाता हूँ_

 सफर पर जाऊँ_ _तो_
 _दुआ भूल जाता हूँ_

_क्या शान है मेरे_ _अल्लाह'' की_
 _फिर भी नवाज़ता है_ _वह नहीं भूलता_

बेलेन्स हो या ना हो ये
     सभी को करना_

में इस काबिल तो नही_

  _जन्नत मागु_


 _=== ऐ अल्लाह  ===_


 _बस इतनी सी अर्ज़ है_

 _के_

      मेरी माँ मेरी जन्नत है

 _उसे सदा_

 _सलामत रखना_

 _आमीन_


एक जवान  लड़के ने


अपने दादा से पूछा


 दादा जान आप लोग पहले कैसे रहते थे


ना कोई टेक्नोलॉजी,

ना कंप्यूटर,

ना मीडिया,

ना मोबाइल,

ना टेलीफोन

ना गाड़ियां

दादा ने जवाब दिया

 जैसे तुम लोग आज रहते हो,

ना नमाज.??

ना दीन..??

ना रोजा.??

ना तरबियत.?

ना अखलाक..??

ना शरम..?

ना हया..??

जरा सोचिए अगर नमाज
पढ़ने के भी पैसे मिला करते तो

 आज हम सब
5 वक्त के नमाजी  होते

 यकीन नहीं रहा किसी भी
 मुसलमान को के

अल्लाह भी मौजूद है

इस लिए ईमान का खत्म हो गयाएक बार मूसा अलैहिस्सलाम ने
अल्लाह तआला से पूछा
की मैं जितना आपके करीब रहता हूँ,
आप से बात कर सकता हूँ
उतना और भी कोई करीब है ?
अल्लाह तआला ने फ़रमाया की
ऐ मूसा आखरी वक़्त में एक उम्मत आएगी वह उम्मत
मुहम्मद (सल्ललाहु अलैहिवसल्लम)की उम्मत होगी
उस उम्मत को एक महीना ऐसा मिलेगा
जिसमे वह सूखे होंठ,
प्यासी जुबान,
सुखी आँखे ,
भूखे पेट,
इफ्तार करने बैठेंगे
तब मैं उनके बहुत करीब रहूँगा
मूसा हमारे और तुम्हारे बीच में 70 पर्दो का फ़ासिला है
लेकिन अफ्तार के वक़्त उस उम्मती और मेरे बीच में एक परदे का भी फासला नहीं होगा
और वो जो दुवा मागेंगे उनकी
दुवा क़बूल करना मेरी जिम्मेदारी है |
             आपकी दुआओ  का तलबगार
   
     मोहम्मद लुक़मान
जामिया इसलामीया कु़रआनिया सेमरा

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