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मैं भी कितना अजीब हूँ

              ﷽ अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहे व बर कातुह  _सेहत मंद हूँ तो_  _अल्लाह`` को भूल जाता हूँ  _बिजी हूँ तो_  _नमाज़'' भूल जाता हूँ_  बुराई करूँ तो  _अंजाम भूल जाता हूँ_  _खाता हूँ तो_  _बिस्मिल्लाह भूल जाता हूँ_  _खा लूँ तो_  _अल्हम्दुलिल्लाह_ _कहना भूल जाता हूँ_  _किसी से मिलूं तो_  _सलाम''भूल जाता हूँ_  _सोते हुए_  _तौबा भूल जाता हूँ_  _गुस्से में तो_  _बर्दाश्त भूल जाता हूँ_  सफर पर जाऊँ_ _तो_  _दुआ भूल जाता हूँ_ _क्या शान है मेरे_ _अल्लाह'' की_  _फिर भी नवाज़ता है_ _वह नहीं भूलता_ बेलेन्स हो या ना हो ये      सभी को करना_ में इस काबिल तो नही_   _जन्नत मागु_  _=== ऐ अल्लाह  ===_  _बस इतनी सी अर्ज़ है_  _के_       मेरी माँ मेरी जन्नत है  _उसे सदा_  _सलामत रखना_  _आमीन_ एक जवान  लड़के ने अपने दादा से पूछा  दादा...

( कब्र मनुष्य को कहती है )

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                     ﷽ अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहे व बरकातुह          मुहतरम हज़रात कब्र मनुष्य को कहती है के  ऐ आदम की औलाद मैने तेरा हर दिन ईन्तेजार किया , क्या तुने मुझे याद किया ?? जरा सुन ! मेरे अंदर अंधेरा है , नमाज की रोशनी लेते आना ! मेरे अंदर गभराहट है , तिलावते कुरआन लेते आना ! मेरे अंदर साँप और बिच्छु है , नबी सलल्लाहु अलैही वसल्लम की सुन्नत लेते आना ! मेरे अंदर आग है , खौफे खुदा का पानी लेते आना !                 !!! याद रख !!! आज अमल है , हिसाब नही ! कल हिसाब होगा , अमल नही अल्लाह पाक हमें अजाबे कबर से बचाए....आमीन !   कयामत के दिन सवाल ये भी पुछा जायेग जवानी कैसे गुजारा माल कैसे कमाया हलाल या हराम। 5जगह हसना  बडे गुनाहों के बराबर है 1.कब्रस्तान में 2.जनाजे के पीछे         3.मजलिस में 4.तिलावत -ऐ- कुरान में 5.मस्जिद मे अकेले हो?      अल्लाह को याद करो परेशान हो?  ...

झूठी क़समें

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                               ﷽ अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बर कातुह। मुहतरम हज़रात ।      कभी कभी हम और आप कसमें खा खा कर ये बताने की       की कोशिश करते हैं कि जो कुछ कह रहे हैं वह सच है। अक्सर लोग ऐसे मौका पर अल्लाह कसम। कुरआन कसम,इमाम से कहा करते हैं ये बात ठीक नहीं । ऐसी कसमें खानी बुरी बात है         अगर आप सच कह रहे हैं तो कसम की क्या ज़रूरत? अगर झूठ बोल रहे हैं तो कसम खाकर आप सुनने वालों को धोखा दे रहे हैं। और अल्लाह के नाम की बेअदबी कर रहे हैं, अगर कोई आप पर कसम के लिए ज़ोर दे और बात सच्ची हो ,तो कसम खा सकते हैं। वर न बेला वजह हरगिज़ कसम न खाएं झूठी कसम खाना बहुत बडा गुनाह है। मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व  वसल्लम ने फरमाया :-        झूठी कसम खाना ऐसा बडा गुनाह है जैसा शिरक करना। ये भी याद रखें अल्लाह के सेवा किसी और का कसम खाना। जैसे ये कहना कुरआन की कसम, बाप की कसम, तुम्हारे सर की कसम, मक्का की कसम, ईमान की कसम ये...

सच और झूठ

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﷽ मुहतरम हज़रात        अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह व बरकातुह          जो बात जिस तरह हो उसको वैसे ही बयान करना चाहिए।अपनी तरफ से उसमे कमी बेशी न करना सच कहलाता है और घटा बढाकर बयान करना या जो न हुआ हो । उसको बताना के होगया । जो होगया उसको कहना के नही हुआ। ये झूठ कहलाता है। जैसे के सुबह को उठने मे देर हो गई औफिस देर से आए , जब औफिस का मालिक या मैनेजर ने पूछा  देर कैसे हूई क्यों हूई। अब अगर आप असली बात बता देते हैं तो ये सच है। और अगर आप ने कह दिया गाडी ,छूट गई ट्रेन लेटे हो गई या कोई और बात बना दी ये झूठ है, इसलाम का हुक्म ये है कि जो बात जिस प्रकार हो । उसको ऐसी ही बयान करो । उसमे कमी बेशी मत करो।          इसलाम ने सच को हर समय पर हर मौके पर लाजिम किया है और झूठ को हराम बताया है।झूठ को गन्दगी और नापाकी फरमाया है ।        रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहे व सल्लम ने फरमाया:- मुसलमान सब कुछ हो सकता है मगर झूठा नहीं हो सकता         हमारे हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अल...

फैसला करने वालों की बुनियादी जिम्मेदारी

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                           ﷽             अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह फैसला_करने- वालों_की_बुनियादी_जिम्मेदारी               किसी भी समाज में एख्तिलाफ और नजा स्वभाविक बात है, ऐसे मामलों के समाधान के लिए लोग परिवार और समाज के अनुभवी बड़े बुजुर्गों की तरफ निहारते हैं और उनके फैसले को मानते हैं। यह एख्तिलाफ जरा बड़ा हो, तो अधिकतर लोग परिवार और समाज के बड़े बुजुर्गों के बजाय सरकारी अदालतों में जाते हैं, मात्र इसलिए कि अदालतें अपने फैसले को लागू करने के लिए पुलिस की ताकत और हुकूमत की सलाहियत भी रखती है। इसी ताकत और सलाहियत के लिये इस्लामी कानून में कूवते नाफिजा का शब्द व्यवहृत है। यह कूवते नाफिजा या पुलिस की ताकत और हुकूमत की सलाहियत "फैसला" का अंश नहीं है, फैसला का मतलब है कानून के अनुसार हक और सच का इजहार। किसी भी मामले में सच को झूठ से अलग करना, दावा और दलील के अनुसार देखना, गवाहों की विवेचना करना, फैसला करने वाले की बुनियादी जिम्मेदारी है। ...

मनुष्य को पैदा करनेका उद्देश्य

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।।।।।।।।।।।।।।।।।।।﷽।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।      अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहिवरकातुह। मानव रचना का उद्देश्य कुरआन ये बयान करताहै कि मै ( अल्लाह  )ने जिन्नात और इनसान को सिर्फ अपनी पूजा के लिए पैदा किया है।         रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि  वसल्लम ने फ़रमाया दुनिया तुम्हारे लिए बनाई गई है और तुम आख़िरत के लिए बनाए गए हो!     कक़ुरआन शरीफ़ और हदीस की रोशनी मे हम अपना  जाएज़ा लेते हैं तो पता चलता है के  अपने मक़सद से कोसो दूर हैं क्योंकि हमनें ज़रूरत को मक़सद बना रखा है और मक़सद को भुला दिया है।       दुनिया हमारे लिए बनाई गई है और ये हमारी जरूरत है मगर इसी दुनिया को हमने अपना मकसद बनाकर अपनी जिंदगी को जो एक क़ीमती धन है बरबाद कर रहे हैं और अपने मकसद यानि इबादत को छोड़ कर अपने रब की नाराजगी और हमेशा की नाकामी काहम सौदा कर रहे हैं।   बहुत सारे लोग तो नमाज़ व रोज़ा और ह़ज व ज़कात अदा करकरे इस खूशी मे हैं के हमनें अपने मक़सद का हक़ अदा कर दिया जबकि ये आमाल इसलाम की बुनियाद हैं पूरा इसलाम नहीं   और अल्...

माँ बाप अनमोल नेअमत हैंं

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﷽ अस्सलामु अलैकुम वरह़मतुल्लाहि व बरकखतुह मुह़तरम ह़ज़रात      जवानी मे मनुष्य पिता को शक की  निगाह से देखता रहता है, जैसे पिता को हमारे सारे उन मुद्दों, आव्श्यकताओं तकलीफों या ज़रूरतों का  एहसास ही नहीं।ये नए युग्य  की आवश्यकताओं को नहीं समझता।    कभी कभी हम अपने पिता का तुलना भी शुरू कर देते हैं, इतनी मेहनत हमारे पिता ने की होती, बचत की होती , कुछ, बनाया होता, तो आज हम भी.... फ़लाँ की तरह आलीशान  बंगला होता ,क़ीमती से क़ीमती गाड़ी मे घूम रहे होते!   कहाँ हो ? कब आओगे?  अधिकांश फुज़ूल और फ़ालतू लगते हैं। सूइटर पहना है कुछ और भी पहन लो ठंड बहुत है मनुष्य सोचता है ओल्ड फैशन की वजह से  पिता को बाहर की दुनिया का अनुभव नहीं। अक्सर औलादें  अपने पिता को एक ही मेयार से परखती हैं ,घर, गाड़ी, पलौट , बैंक बैलेंस, कारोबार अपनी नाकामी इत्यादि बाप के खाते में डाल कर  अपने आप को बहुत ज्यादा समझदार बनते हैं। हमारे भी कुछ होता तो हम भी अच्छे स्कूल मे पढते  कारोबार करते।       इसमे शक नहीं, औलाद केलिए आइडियल ...